कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 4 • कथा GArKvjsqKfVMqzXhMFnB
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मधुराष्टकम् केवल एक स्तोत्र नहीं है, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम और भक्ति की एक मधुर अभिव्यक्ति है। इसकी रचना 16वीं शताब्दी के महान दार्शनिक और भक्ति मार्ग के प्रणेता जगद्गुरु श्री वल्लभाचार्य जी ने की थी। श्री वल्लभाचार्य जी "पुष्टि मार्ग" के संस्थापक थे। वे श्रीकृष्ण के 'बाल स्वरूप' और 'लीला पुरुषोत्तम' रूप के अनन्य भक्त थे। कहा जाता है कि वल्लभाचार्य जी जब भक्ति के चरम पर थे, तब उन्हें साक्षात श्रीकृष्ण के दर्शन हुए। उस दिव्य दर्शन से अभिभूत होकर, उनके मुख से जो शब्द निकले, वही मधुराष्टकम् कहलाए। इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके हर छंद का अंत "मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्" से होता है।
