मनुष्य को चाहिए कि वह हर क्षण भगवान का नाम जपता रहे। जैसे कोई कंजूस अपने धन के एक-एक पैसे को बहुत संभालकर रखता है, उसी प्रकार हमें अपने जीवन के हर क्षण को भगवान की भक्ति में लगाना चाहिए। जब तक भजन और नामस्मरण नहीं होता, तब तक महात्माओं के वास्तविक स्वरूप को समझ पाना कठिन रहता है। जितना अधिक भजन किया जाएगा, उतना ही अंतःकरण निर्मल होगा और भगवान तथा संतों का सच्चा स्वरूप हृदय में प्रकाशित होने लगेगा। इस संसार में मन को शुद्ध करने की सबसे बड़ी औषधि है — निरंतर नामजप। जहाँ तक संभव हो, भगवान का नाम स्वयं भी लें और अपने कानों से उसे सुनें। भगवान और महापुरुष चाहें तो एक ही क्षण में किसी को अपने समान बना सकते हैं, परंतु वे ऐसा तुरंत नहीं करते। यदि वे ऐसा कर दें, तो जो भक्त दिन-रात भगवान का नाम लेकर, आँसू बहाकर उन्हें पुकारते हैं, उनके प्रेम और साधना का मान कम हो जाएगा।
कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 39 • कथा erVmIkbJb2Ur0fsa7k3X
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