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पौराणिक कथाएँ 24
पौराणिक कथाएँ 24
पौराणिक पावन कथा
कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 24 • कथा TBWLI8VQ1yTrXXnaqw54
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ओडिशा के पुरी धाम में भगवान जगन्नाथ का श्रीमंदिर स्थापित है. कहते हैं कि सागर तट पर युगों-युगों से भगवान नीलमाधव का पुरुषोत्तम क्षेत्र मौजूद है और इसका जिक्र भविष्य पुराण में भी है. इसी आधार पर भारत भूमि में चार धाम स्थापित हैं. उत्तर में बद्रीनाथ जो कि पहाड़ों में है. पश्चिम में सागर तट पर द्वारिका, पूर्व में सागर तट पर जगन्नाथ और दक्षिण में सागर तट पर रामेश्वरम. साधु समाज में एक और बात कही जाती है कि सतयुग में भगवान चमत्कारी अवतार लेकर आए. कभी मछली बने, कभी सिंह तो कभी वराह. त्रेता में वह संत हित के लिए खुद ऋषि बनकर परशुराम बनकर आए. फिर वह जन-जन के राम बने. द्वापर में वह भक्त, सखा, मित्र और धर्म के रक्षक बनकर आए, लेकिन उन्हें भक्तों की भक्ति देखने के लिए भक्त भी बनना था. वह अपने भक्तों के भी भक्त बनना चाहते थे, इसलिए वह जगन्नाथ बन कर आए. इस रूप में न उनके हाथ हैं और न ही पैर. केवल बड़ी-बड़ी आखें हैं. वह चाहते हैं कि उनकी नजरों से कोई भक्त रह न जाए. वह कहीं नहीं जाना चाहते हैं, बस जो उनके पास आए वह उसके होकर रह जाना चाहते हैं. इसीलिए भक्त होते हुए भी वह जगन्नाथ हैं. श्रद्धालु जिस रूप में सच्चे हृदय से उनके दर्शन करना चाहते हैं, भगवान वैसे ही रूप में उन्हें दर्शन देते हैं. पुरी धाम में इससे जुड़ी एक लोककथा भी काफी प्रचलित है. यह कथा भगवान की 'अनासर विधि' से जुड़ी हुई है. कथा के मुताबिक, भगवान ने अपने एक भक्त को श्रीगणेश का अवतार लेकर दर्शन दिए थे. उनकी यह कथा गणेश चतुर्थी के साथ भी जुड़ती है और गणेश पूजा के दौरान पुरी व अन्य पूजा पंडालों में सुनाई भी जाती है.पुराणों में लिखा है कि कलियुग में भगवान नीलमाधव भक्तों को उनकी इच्छा के अनुसार दर्शन देते हैं. वह भक्तों के बीच ही निवास करेंगे. इसी आधार पर यह कथा कही जाती है. कहते हैं कि 16वीं शताब्दी में महाराष्ट्र के एक गांव में एक मूर्तिकार गणेश भक्त गणपति भट्ट रहते थे. वह दिन-रात गणपति बप्पा की भक्ति में ही लीन रहते थे. एक समय वह तीर्थ यात्रा पर निकले. इस तरह हर ओर की यात्रा के बाद वह पुरी (ओडिशा) पहुंचे.

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