सिलपिल्ले (कृष्ण) भगवान् की भक्त – दो कन्याएँ श्री भक्तमाल ग्रंथ में नाभादास जी ने लिखा है कि ठाकुर सिलपिल्ले (श्रीकृष्ण) की दो भक्त कन्याएँ थीं। उनमें से एक राजा की कन्या थी और दूसरी जमींदार की कन्या। एक दिन राजा के महल में एक संत भगवान् पधारे। वे संत प्रेमपूर्वक महल में कुछ दिनों तक विराजमान रहे। उसी समय राजा और जमींदार की दोनों कन्याएँ महल में खेल रही थीं। खेलते-खेलते उनकी दृष्टि संत भगवान् की ओर गई। उस समय संत भगवान् अपने शालिग्राम जी की सेवा में मग्न थे। दोनों कन्याओं ने देखा कि संत जी एक गोल काले पत्थर (शालिग्राम जी) को स्नान करा रहे हैं, सुंदर तुलसीदल अर्पित कर रहे हैं, प्रेमपूर्वक पद गाकर सुना रहे हैं, चंदन और सुगंध अर्पण कर रहे हैं तथा भोग लगा रहे हैं। संतों ने कहा है कि जिस समय यह घटना हुई, उस समय इन दोनों कन्याओं की आयु लगभग आठ वर्ष थी। दोनों कन्याओं ने संत भगवान् से पूछा — “महाराज! आप यह क्या कर रहे हैं? ” संत भगवान् ने उन्हें समझाया — “यह साधारण पत्थर नहीं है, बल्कि स्वयं श्रीभगवान् हैं और मैं उनकी सेवा कर रहा हूँ। ” संत जी ने उन दोनों को भगवान् का चरणामृत और प्रसाद भी दिया। इससे उनके मन में भी भगवान् की सेवा करने की उत्कंठा उत्पन्न हुई। महल में संत जी का प्रवचन भी हुआ। प्रवचन सुनकर दोनों कन्याओं के हृदय में भगवत्-प्रेम और भी अधिक जागृत हो गया। उन्होंने संत भगवान् से विनती करते हुए कहा — “हमें भी आप जैसी सेवा करनी है। हम भी सुकुमार श्यामसुंदर की पूजा करना चाहती हैं। कृपा करके हमें भी ठाकुर जी की मूर्ति प्रदान कीजिए। ” उन दोनों के मन में यह भाव उत्पन्न हुआ कि यही संत हमारे सद्गुरुदेव हैं। संत ने दोनों कन्याओं के भाव को देखकर मन में विचार किया कि ये दोनों अभी बहुत छोटी हैं। यदि भगवान् की सेवा में कोई त्रुटि हो गई तो अपराध हो जाएगा। शास्त्रों में कहा गया है कि शिष्य से यदि सेवा में कोई त्रुटि हो जाए तो उसका दोष गुरु को भी लगता है। संत ने सोचा कि जब ये बड़ी हो जाएँगी तब इन्हें भगवान् की मूर्ति प्रदान करेंगे। इसलिए पहले उन्होंने मना कर दिया। परंतु दोनों कन्याओं की आँखों से आँसू बहने लगे। संत ने देखा कि ये भगवान् के लिए रो रही हैं। भले ही ये अभी छोटी हैं और अनभिज्ञ हैं, परंतु निश्चित ही ये पूर्व जन्म की कोई महान भक्ताएँ हैं।
कथा प्रसंग 1
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