ब्रज के खेतों में सुनहरी धूप खिली थी। कुंभनदास जी, जिनका रोम-रोम श्रीनाथजी के प्रेम में रचा-बसा था, अपने खेत में खड़े थे। उनका मन फसल काटने में नहीं, बल्कि उस "लाला" (बालकृष्ण) में अटका था, जो उनके हर श्वास में बसते थे। अचानक, एक मधुर स्वर गूंजा, "कुंभन... मुझे भूख लगी है! पर आज मुझे मंदिर के राजसी छप्पन भोग नहीं चाहिए। मुझे तुम्हारे घर का वो सोंधा स्वाद चाहिए। " कुंभनदास जी मुस्कुराए, उनकी आँखें भर आईं। "मेरे प्रभु को क्या चाहिए? " श्रीनाथजी ने नटखटपन से उत्तर दिया, "एक सीधा-सादा भोज! ज्वार की महेरी (दलिया), ताजा दही, दूध, बेजर की सोंधी रोटियाँ, टेटी (कैर) की सब्जी और केरड़े का तीखा अचार... बस इतना ही, इससे ज्यादा कुछ नहीं! " सरल तैयारी कुंभनदास जी की भतीजी कलेवा (भाथा) लेकर खेत पर पहुँची। अपने चाचा की आँखों में दिव्य चमक देखकर वह समझ गई कि आज कोई अलौकिक लीला होने वाली है।
कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 17 • कथा 7s8TK0XWfD1M6PrhhYbW
1 / 4
