कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 17 • कथा Cbvaw8QY23Ml7jgfgIV1
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फूलडोल बाबा वृन्दावन के एक विरक्त संत थे। उनका कोई घर नहीं था, कोई संपत्ति नहीं थी। वे केवल यमुना किनारे या किसी वृक्ष के नीचे बैठकर निरंतर 'राधे-राधे' रटते रहते थे। उनकी भक्ति ऐसी थी कि वे बाहरी जगत से पूरी तरह कट चुके थे। कड़कड़ाती ठंड और भक्त की परीक्षा पौष का महीना था। वृन्दावन में हाड़ कँपाने वाली ठंड पड़ रही थी। यमुना से उठती बर्फीली हवाएं शरीर को चीर रही थीं। फूलडोल बाबा के पास तन ढकने के लिए केवल एक फटी हुई सूती चदरिया थी। वे थर-थर कांप रहे थे, लेकिन उनकी जिह्वा पर 'नाम' का जाप थमा नहीं था। तभी मध्य रात्रि में, एक छोटा सा बालक वहाँ आया। उसके हाथ में एक सुंदर, भारी और गरम काली कमली (कंबल) थी। बालक ने बाबा के पास आकर चुपचाप वह कंबल उनके कंधों पर डाल दिया।
