कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 17 • कथा oa7wP5rCEKuFpkcMYCMv
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भगवान श्रीकृष्ण के अथक प्रयत्नों के बाद भी महाभारत का महासंग्राम टल न सका। इस बात से महामुनि उत्तंक के हृदय में तीव्र आक्रोश उमड़ रहा था। उन्हें लगता था कि यदि स्वयं नारायण चाह लेते, तो यह विनाश रुक सकता था। संयोगवश उसी समय भगवान श्रीकृष्ण द्वारिका की ओर जाते हुए मुनि उत्तंक के आश्रम पर आ पहुँचे। उन्हें देखते ही मुनि के संयम के बाँध टूट गए। कटु स्वर में बोले— “आप सर्वशक्तिमान होकर भी इस युद्ध को रोक न सके! क्या आपको इसके लिए शाप देना अनुचित होगा? ” श्रीकृष्ण मंद मुस्कान के साथ बोले— “महामुनि! जब किसी को विवेक दिया जाए, सत्य का मार्ग दिखाया जाए, और फिर भी वह उसे ठुकरा दे, तो उस अपराध का भार मार्गदर्शक पर कैसे डाला जा सकता है? यदि मुझे ही सब कुछ कर देना होता, तो इस संसार में मनुष्य को कर्म और निर्णय का अधिकार क्यों दिया जाता?
