श्लोक संख्या 1
Mahabharata Part 3 : Vanaparva • अध्याय 0gqLFxnxjZdhtsvaYmkV
1 / 19
जब रावण माता सीता का बलपूर्वक हरण करके आकाशमार्ग से लंका की ओर ले जा रहा था, तब सीताजी की करुण पुकार सुनकर पक्षीराज जटायु ने आकाश में उड़ान भरी। जटायु राजा दशरथ के परम मित्र थे। उन्होंने रावण को ललकारते हुए कहा कि हे निशाचर! मेरे जीवित रहते हुए तू मेरे मित्र की पुत्रवधू को नहीं ले जा सकता। जटायु ने अपने तीक्ष्ण पंजों, चोंच और पंखों से रावण पर भीषण प्रहार किए और उसके रथ को तोड़ डाला। क्रुद्ध रावण ने अपनी तीक्ष्ण तलवार से जटायु के दोनों पंख काट डाले।
