श्लोक संख्या 1
Mahabharata Part 3 : Vanaparva • अध्याय 0sSQQ8LQfV7wBWdwCI54
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मिथिला नगरी में धर्मव्याध के गृह पर उपस्थित होकर कौशिक ब्राह्मण ने बड़ी श्रद्धा से पूछा कि हे धर्मज्ञ! धर्म की गति अत्यंत सूक्ष्म और समझने में कठिन है। कृपा करके मुझे जीवात्मा की नित्यता, कर्मफल के भोग और इन्द्रिय-संयम का यथार्थ रहस्य समझाइए। धर्मव्याध ने हाथ जोड़कर कहा कि हे विप्रवर! सत्य और असत्य का निर्णय केवल शब्दों से नहीं, बल्कि उनके परिणामों से होता है। यदि असत्य बोलने से किसी निर्दोष के प्राणों की रक्षा होती है, तो वह असत्य भी सत्य के समान परम धर्म बन जाता है।
