श्लोक संख्या 1
Mahabharata Part 3 : Vanaparva • अध्याय 4q9BDxPWQs8RvkLjYjaN
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द्वैतवन के शांत वातावरण में निवास करते हुए भी महारानी द्रौपदी का हृदय अपने अपमान और पाण्डवों के दारुण कष्टों को देखकर निरंतर व्यथित रहता था। एक दिन जब पाँचों पाण्डव एकांत में बैठे थे, तब द्रौपदी अपने आंसुओं को रोक न सकीं और धर्मराज युधिष्ठिर से अत्यंत व्यथित होकर कहने लगीं। द्रौपदी ने कहा कि हे राजन्! जिन दुष्ट कौरवों ने कपट-द्यूत में हमें छल से जीता, वे आज स्वर्ण-महलों में सुख भोग रहे हैं। वहीं दूसरी ओर आप जैसे सत्यवादी और धर्मपरायण महाराज आज इस भयानक वन में कुशा और कास के बिछौने पर सो रहे हैं।
