श्लोक संख्या 1
Mahabharata Part 3 : Vanaparva • अध्याय YMAfmQydGbpAEEJHnRwT
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गंधमादन पर्वत पर निवास करते हुए एक दिन प्रातःकाल पुरोहित धौम्य ने धर्मराज युधिष्ठिर को चारों दिशाओं के दिव्य लोकों, अस्ताचल, संयमनी पुरी और मेरु पर्वत के पावन शिखरों के दर्शन कराए। उसी समय आकाश में सहस्रों सूर्यों के समान देदीप्यमान देवराज इन्द्र का दिव्य रथ उतरता दिखाई दिया। उस स्वर्णमयी रथ में दस हजार वायुगामी घोड़े जुते हुए थे और मातलि उसकी रास थामे हुए थे। उस रथ में दिव्यास्त्रों से सुसज्जित, मुकुटधारी किरीटमाली अर्जुन को देखकर पाण्डवों और द्रौपदी के हर्ष का कोई पार न रहा।
