भक्त नरसी मेहता के जीवन की यह घटना 'अतुलनीय विश्वास' का प्रतीक है। जब संसार ने उन्हें ठग और कंगाल समझकर उनका उपहास उड़ाया, तब स्वयं द्वारकाधीश ने एक 'मुनीम' बनकर उनके फटे हुए कागज की लाज रखी। सांवरिया सेठ की हुंडी: जब 'शून्य' बहीखाता 'अनंत' हो गया जूनागढ़ के नरसी मेहता के पास न रहने को महल था, न खाने को अन्न। उनके पास थी तो बस एक फटी हुई 'बहीखाता' (लेखा-जोखा की डायरी), जिसमें वे केवल 'राम-नाम' का हिसाब लिखते थे। लोग उन्हें पागल समझते थे, क्योंकि वे अपनी बेटी के विवाह और घर के खर्चों के लिए भी केवल करताल बजाकर भजन किया करते थे। उपहास की पराकाष्ठा एक बार कुछ शरारती और अभिमानी व्यापारियों ने नरसी का मजाक उड़ाने की योजना बनाई। द्वारका जाने वाले कुछ तीर्थयात्री जूनागढ़ रुके। उन व्यापारियों ने यात्रियों से कहा— "अगर तुम्हें द्वारका में धन की आवश्यकता पड़े, तो इस नरसी मेहता से 'हुंडी' (पुराने समय का चेक) लिखवा लो।
कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 15 • कथा HdQcWLrDkjFcz3QAfaiQ
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