यह कहानी रामायण के उस अंतिम अध्याय से जुड़ी है जिसे 'राम का महाप्रयाण' कहा जाता है। अयोध्या में राम का शासन (राम-राज्य) अपने शिखर पर था। एक दिन एक अत्यंत तेजस्वी तपस्वी राजमहल के द्वार पर आए। वे कोई साधारण ऋषि नहीं, बल्कि स्वयं 'काल' (समय/मृत्यु) थे, जो भगवान विष्णु के आदेश पर राम को यह याद दिलाने आए थे कि उनके अवतार का समय अब पूरा हो चुका है। काल ने राम से कहा, "प्रभु, मैं आपसे एकांत में वार्ता करना चाहता हूँ। जब तक हम बात करें, कोई भी कक्ष में प्रवेश न करे। जो हमारी बात में बाधा डालेगा, उसे आपको मृत्युदंड देना होगा। " राम ने मर्यादा की रक्षा के लिए यह शर्त स्वीकार कर ली। उन्होंने अपने सबसे प्रिय भाई लक्ष्मण को द्वार पर खड़ा कर दिया और कहा, "लक्ष्मण, ध्यान रहे, कोई भी भीतर न आए, अन्यथा मुझे तुम्हें मृत्युदंड देना पड़ेगा। " हनुमान को दूर भेजने की युक्ति राम जानते थे कि जब तक हनुमान द्वार पर पहरा दे रहे हैं, काल (यम) उनके पास आने का साहस भी नहीं कर सकता।
कथा प्रसंग 1
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