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पौराणिक कथाएँ 9
पौराणिक कथाएँ 9
पौराणिक पावन कथा
कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 9 • कथा zYY0jx06RTrzlbthuIyQ
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जाजलि पौराणिक युग के एक महान ऋषि थे। एक बार उन्होंने कठिन तपस्या करने की ठानी। वे एक वन पहुँचे जो जँगली जानवरों से भरा हुआ था। उसी वन में उन्होंने एक जगह अन्न-जल त्याग कर तपस्या प्रारम्भ की। वे तपस्या में ऐसे लीन हुए कि स्तंभित से हो गए। यहाँ तक कि उन्होंने अपनी प्राण-वायु को भी नियंत्रित कर रोक लिया और अविचल भाव से खड़े तपस्या करते रहे। बहुत समय बीत गया और उनकी लम्बी जटाओं ने उनके शरीर को घेर लिया। आस पास की लताएँ भी उनके चारो ओर लिपट गयीं। उनको एक वृक्ष समझ कर कई पक्षियों ने उनके ऊपर अपना घोंसला बना लिया। समय बीतता गया और पक्षियों ने कई अंडे दिए जिससे अन्य पक्षियों का जन्म हुआ। महर्षि जाजलि का शरीर एक वृक्ष की भांति बन गया जिसपर कई जीव-जंतुओं ने अपना ठिकाना बना लिया। बहुत काल के बाद जब उनकी तपस्या भंग हुई तो अपनी वो दशा देख कर स्वयं उन्हें भी अपनी इस कठिन तपस्या पर आश्चर्य हुआ। साथ ही साथ उन्हें इस बात का अभिमान भी हो गया कि उनके जैसी कठिन तपस्या कोई और नहीं कर सकता। उसी अभिमानवश उन्होंने आकाश की ओर देखकर कहा "आज मैंने धर्म को पा लिया। " ईश्वर ने जब देखा कि उनका अनन्य भक्त अभिमान के वश में आ गया है तो उन्होंने उसे सही मार्ग पर लाने की ठानी। उसी समय एक आकाशवाणी हुई - "हे जाजलि!

सनातन ज्ञान धारा • Timeless Spiritual Guidanceकृतान्त शास्त्र संग्रह
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