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पौराणिक कथाएँ 11
पौराणिक कथाएँ 11
पौराणिक पावन कथा
कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 11 • कथा RfI8Relmrezx98mmRrv1
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मेवाराम कपड़े का एक बहुत बड़ा व्यापारी था घर में किसी चीज की कमी नहीं थी। एक लड़का, एक लड़की, सुन्दर पत्नी पूरा संस्कारी परिवार था। घर में एक बहुत ही सुन्दर और विशाल मन्दिर जिसमें ठाकुर जी और किशोरी जी की भव्य मूर्ति जिसका उसकी पत्नी नित्य बहुत सुन्दर श्रृंगार करती थी। नित्य नए-नए वस्त्र धारण करवाती थी, तरह-तरह के व्यंजनों से ठाकुर जी और किशोरी जी को भोग लगाती थी। मेवाराम अपनी पत्नी को इस लग्न से ठाकुर जी की सेवा करते देखकर बहुत आनन्दित होता था और मन में सोचता था कि मैं कितना सौभाग्यशाली हूँ जो मुझे इतनी संस्कारी पत्नी मिली है और इतनी अच्छे संस्कार उसने अपने बच्चों को दिए हैं। वह मन ही मन सोचता मेरा घर किसी मन्दिर से कम नहीं है वह बस इसी बात से अन्दर खुश होता रहता था मैं तो धरती पर ही स्वर्ग देख रहा हूँ। उस स्वर्ग से सुन्दर घर को उस समय नजर लग गई जब अचानक से किसी बीमारी के कारण उसकी पत्नी ठाकुर धाम को प्यारी हो गई। पत्नी की एकदम से चले जाने के बाद मेवाराम तो एकदम से टूट गया अब तो उसका किसी चीज में मन नहीं लगता था इतना बड़ा व्यापारी काम ठीक ढंग से ना करने के कारण उसका काम ठप्प हो गया। इतनी बड़े दुकान से अब वह बिल्कुल छोटी सी दुकान पर आ गया। जिससे घर का गुजारा बड़ी मुश्किल से होता था। घर में हर चीज की कमी आ गई थी। खाने-पीने में, बच्चों की पढ़ाई में। लेकिन मेवाराम ने ठाकुर जी की सेवा में कोई कमी ना आने दी क्योंकि ठाकुर जी की सेवा करके उसको ऐसा लगता था जैसे वह अपनी पत्नी के अधूरी सेवा को पूरा कर रहा है अब तो वह ठाकुर जी को भोग लगाकर उनकी सेवा करके ही मन को तसल्ली दे देता था। छोटी सी दुकान का पर कमाई बड़ी मुश्किल से होती थी। क्योंकि छोटी सी दुकान पर भी मेवाराम ठीक तरह से मन लगाकर नहीं जा पाता था। अब तो धीरे-धीरे बच्चों को भी समझ आ गई कि मेवाराम हमारी पढ़ाई का खर्चा नहीं उठा पाएगा इसलिए बच्चे संस्कारी होने के कारण अपने पिता को तंग नहीं करना चाहते थे उन्हें खुद ही मेहनत करके खुद ही पढ़ना शुरू कर दिया। बच्चे पहले नौकरी पर जाते बाद में पढ़ते। घर पर सारा दिन केवल मेवाराम अकेला रहता था। मेवाराम ठाकुर जी के लिए अपने दुकान से लाए हुए कपड़े से उनके लिए एक पोशाक बनाना चाहता था लेकिन अब उसमें वह शक्ति नहीं रही थी और ना ही उसकी आँखें इतना काम करती थी लेकिन फिर भी वह रोज धीरे-धीरे थोड़ा-थोड़ा करके ठाकुरजी और किशोरी जी के लिए पोशाक बनाने का काम करता। 6 महीने बीत गए उसकी पोशाक बनकर तैयार नहीं हुई थी। वह अपने आप को बहुत कोसता था कि मेरी पत्नी तो हर रोज ठाकुर जी को नए नए वस्त्र धारण करवाती थी लेकिन मैं बदकिस्मत ऐसा नहीं कर पा रहा हूँ कई बार तो वस्त्र सिलते सिलते उसके हाथों में सुई चुभ जाती लेकिन उसको इस दर्द में भी आनन्द चाहता आता था। रात को सोने से पहले वह ठाकुर जी की पूरी सेज सजाता ठाकुर जी और किशोरी जी के लिए पीने के लिए साफ जल रखता खाने के लिए कभी खीर और कभी हलवा कचोरी रखता।

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