यह कथा बहुत पुरानी है। एक बार शीतला माता ने मन में विचार किया कि आज मैं स्वयं धरती पर जाकर देखूँ कि कौन मेरी पूजा करता है और कौन मुझे मानता है। यही सोचकर शीतला माता धरती पर राजस्थान के डुंगरी गाँव में आईं। वहाँ आकर उन्होंने देखा कि इस गाँव में न तो उनका कोई मंदिर है और न ही उनकी पूजा होती है। शीतला माता गाँव की गलियों में घूम रही थीं। तभी एक मकान की छत से किसी ने चावल का उबला हुआ पानी (मांड) नीचे फेंक दिया। वह खौलता हुआ पानी शीतला माता के ऊपर गिरा, जिससे उनके शरीर पर छाले पड़ गए और पूरे शरीर में भयंकर जलन होने लगी। शीतला माता इधर-उधर भागते हुए चिल्लाने लगीं— “हाय! मैं जल गई, मेरा शरीर तप रहा है। कोई मेरी सहायता करो। ” परंतु उस गाँव में किसी ने उनकी सहायता नहीं की। उसी समय अपने घर के बाहर एक कुम्हारन बैठी हुई थी। उसने देखा कि एक बूढ़ी माई बहुत बुरी तरह जल गई है। उसके पूरे शरीर पर छाले पड़ गए हैं और वह जलन सहन नहीं कर पा रही है। कुम्हारन ने करुणा से कहा—
कथा प्रसंग 1
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