श्लोक संख्या 1
Mahabharata Part 14 : Ashvamedhikaparva • अध्याय YAwOXDlHNNp6RQ7Dm5QJ
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धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में नमन करते हुए समस्त पापों का नाश करने वाले परम पावन 'चान्द्रायण-व्रत' की विधि पूछी। भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया कि चान्द्रायण व्रत मनुष्य की आत्मा को पूर्णतः निष्पाप और निर्मल बना देता है। इस व्रत का नियम चंद्रमा की कलाओं के घटने और बढ़ने पर आधारित है। शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को एक ग्रास (कौर) भोजन से आरंभ करके पूर्णिमा तक प्रतिदिन एक-एक ग्रास बढ़ाया जाता है, जिससे पूर्णिमा को पंद्रह ग्रास होते हैं।
