श्लोक संख्या 1
Mahabharata Part 13 : Anushasanaparva • अध्याय 9C473xDAgpen7Zx2Q7uP
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धर्मराज युधिष्ठिर ने शरशैया पर आसीन पितामह भीष्म के सम्मुख हाथ जोड़कर एक अत्यंत गंभीर प्रश्न किया। हे पितामह! धर्म की गति अत्यंत सूक्ष्म और अगाध बताई गई है। क्या किसी को सद्भावनापूर्वक उपदेश देने अथवा दान की प्रतिज्ञा पूरी न करने से भी मनुष्य को भिन्न-भिन्न योनियों में जन्म लेना पड़ता है? कृपया मुझे पूर्वजन्म के कर्मों और उनके विचित्र फलों को स्पष्ट करने वाला कोई प्रेरक इतिहास सुनाइए।
