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पौराणिक कथाएँ 6
पौराणिक कथाएँ 6
पौराणिक पावन कथा
कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 6 • कथा K051mNbHQ04uElWaveQ1
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कभी भी ऐसा आहार ग्रहण न करें, जो भगवान को भोग न लगाया गया हो। जो भोजन भगवान को भोग लगाया गया है, वही प्रसाद रूप में ग्रहण करें। . एक भक्त हुए हैं, जिनका नाम अंगद जी था। वैसे तो वे स्वभाव से पहले नास्तिक प्रवृत्ति के थे, लेकिन उनकी पत्नी भगवान की भक्त थीं। . उनके मायके में संतों की सेवा होती रहती थी, और वहां उनके गुरुदेव के उपदेश सुनने को मिलते थे। . विवाह के बाद जब वे अंगद जी के साथ ससुराल आईं, तो देखा कि वहां राज वैभव तो था, लेकिन न किसी संत का दर्शन संभव था, न किसी संत का आना-जाना, न भगवद् चर्चा होती थी और न ही सत्संग। . रानी बहुत व्याकुल हो गईं। उन्हें मायके में रोज संतों का उच्छिष्ट मिलता था, सद्गुरु देव भगवान के दर्शन होते रहते थे, लेकिन यहां भक्ति का कोई भी वातावरण नहीं था। . हालांकि, अंगद जी की एक विशेषता थी- वे अपनी पत्नी को भगवद् भक्त मानकर बहुत श्रद्धा करते थे और उनके भक्ति मार्ग में कोई विरोध नहीं करते थे। . लेकिन स्वयं न तो भक्ति का आचरण करते थे, न संत-महात्माओं के प्रति कोई श्रद्धा रखते थे, और न ही भगवान की आराधना करते थे। . काफी दिनों तक संतों के दर्शन न होने के कारण रानी अत्यंत व्याकुल हो गईं। . उन्होंने अपने मायके पत्र लिखकर प्रार्थना की कि सद्गुरु देव भगवान से निवेदन करें कि कृपा करके एक बार यहां पधारें और दर्शन दें, क्योंकि मैं यहां से बाहर नहीं जा सकती और मेरे पति संतों के प्रति श्रद्धावान नहीं हैं। . जब मायके के राज परिवार ने गुरुदेव से प्रार्थना की, तो वे करुणामय होने के कारण आने के लिए सहमत हो गए। . गुरुदेव के आगमन से रानी अत्यंत हर्षित हो गईं। उन्होंने चरणामृत ग्रहण किया, आरती उतारी, भोग अर्पित किया और गुरुदेव को आसन पर विराजमान किया। फिर वे धीरे-धीरे उनके चरण दबाने लगीं। . इतने में अंगद जी वहां आ गए और अपनी रानी को किसी संत के चरण पकड़े हुए देखा। यह दृश्य देखकर वे क्रोधित हो गए और संत भगवान से बिगड़ने लगे। . रानी के तो होश उड़ गए! इतनी प्रार्थना के बाद गुरुदेव स्वयं पधारे थे, और अब उनके पति ही उनका अपमान कर रहे थे!

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