कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 22 • कथा BR4Yax17AM1KRqgdaVjp
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यह वृन्दावन की उन पावन गलियों की कथा है जहाँ काल का नियम नहीं, बल्कि 'लाड़ली जी' (श्री राधा) का विधान चलता है। वृन्दावन का वह रहस्यमयी सन्नाटा श्री धाम वृन्दावन की कुंज गलियों में स्थित निधिवन के समीप एक छोटी सी कुटिया थी। यहाँ निवास करते थे— परम भक्त गोंड बाबा। बाबा का जीवन भक्ति की उस पराकाष्ठा पर था, जहाँ व्यक्ति देह में रहते हुए भी विदेही हो जाता है। उनके होंठ भले ही शांत रहते, पर उनके हृदय की धड़कन से निरंतर एक ही ध्वनि गूँजती थी— "राधे... राधे..."। एक ठंडी संध्या, जब यमुना की लहरें शांत थीं, बाबा की कुटिया में सन्नाटा छा गया। बाबा अचेत पड़े थे। नाड़ी शांत थी, शरीर बर्फ सा ठंडा पड़ चुका था और प्राण पखेरू उड़ने ही वाले थे। शिष्यों ने रुदन करते हुए अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू कर दी।
