श्लोक संख्या 1
Ramayana Part 1 : Baalkand • अध्याय CvHjEjrFLmOSxAZhbqAO
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दशरथनंदन श्रीरामचंद्र जी अपने पिता के गौरव का ध्यान रखकर संकोचवश वहाँ कुछ बोल नहीं रहे थे। परंतु जमदग्निकुमार परशुराम जी की अहंकारपूर्ण और चुनौतीपूर्ण बात सुनकर उस समय वे मौन न रह सके। उन्होंने परशुराम जी की ओर देखा और अत्यंत संयत परंतु दृढ़ स्वर में कहा, 'भृगुनंदन! ब्रह्मन्! आपने पिता के ऋण से उऋण होने की भावना से जो क्षत्रिय-संहार रूपी कर्म किया है, उसे मैंने सुना है।' श्रीराम ने उनकी बीती हुई बातों का सम्मान किया।
