यह कहानी भारतीय भक्ति परंपरा की उस अनमोल विरासत का हिस्सा है, जहाँ ईश्वर और भक्त के बीच मजहब की दीवारें ढह जाती हैं। आगरा के एक संभ्रांत और प्रतिष्ठित मुस्लिम परिवार में डॉ. इकबाल अहमद की सुपुत्री जमीरन का जन्म हुआ। वह अत्यंत सुंदर और सुशील थी। मात्र 9 वर्ष की आयु में उसका निकाह लखनऊ के एक बेरिस्टर के पुत्र से कर दिया गया। किंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था; जमीरन अभी ससुराल भी नहीं पहुँची थी कि उसके पति का देहांत हो गया। 14 वर्ष की अल्पायु में वह विधवा हो गई। मुस्लिम समाज में पुनर्विवाह की अनुमति होने के बावजूद जमीरन ने शादी से साफ मना कर दिया। भाई और पिता ने डराया, कुरान का वास्ता दिया, पर वह अडिग रही। वह गुमसुम रहने लगी, नमाज में उसका मन नहीं लगता था और वह घंटों एकांत में आंसू बहाया करती। घरवाले परेशान थे, हकीम-डॉक्टर हार गए, पर उसके 'मन के रोग' का इलाज किसी के पास न था।
कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 48 • कथा 6nmd4QYKTeYOe0mxNPu4
1 / 4
