पुराणों में वर्णित चैत्र अमावस्या व्रत कथा केवल एक रोचक प्रसंग नहीं है बल्कि यह व्रत की शक्ति और अमावस्या के गूढ़ फल को भी संकेत देती है। कथा के अनुसार किसी प्राचीन नगर में एक पराक्रमी राजा राज्य करता था। राजा की रानी स्वभाव से अत्यंत धार्मिक, सरल और श्रद्धावान थी। वह नियमित रूप से अमावस्या व्रत करती, दान देती और देव पूजन में विशेष रूचि रखती थी। राजमहल के ठीक सामने एक धनी साहूकार की भव्य हवेली थी। समय के साथ रानी और उस साहूकार की पत्नी के बीच घनिष्ठ मैत्री स्थापित हो गई। दोनों स्त्रियां एक दूसरे से अपने सुख दुख की बातें साझा करती थीं। रानी के पास राजसत्ता का वैभव था, परंतु एक बुंद भी अभिमान नहीं था। उसके भीतर केवल धर्म और व्रत की भावना प्रबल थी। साहूकार के घर का दुखद समाचार एक दिन राजमहल के प्रांगण में बैठी रानी ने साहूकार की हवेली की दिशा से जोर जोर से रोने की आवाज सुनी। रानी चौंक उठी और तत्क्षण अपनी सखी के पास पहुंच गई। वहां जाकर देखा तो साहूकार की पत्नी विलाप कर रही थी और घर का वातावरण शोक से भर गया था। रानी ने शांत स्वर में पूछताछ की कि ऐसा कौन सा दुख आ पड़ा है कि पूरा घर रो रहा है। तब साहूकार की पत्नी ने भारी मन से बताया कि उसके इकलौते पुत्र की मृत्यु हो गई है। यह सुनते ही आसपास के सभी लोग शोकाकुल हो गए। रानी के लिए यह बात समझना कठिन था, क्योंकि पुत्र वियोग का अनुभव उसे स्वयं नहीं हुआ था। रानी का प्रश्न और राजा का पहला उत्तर रानी जब महल लौटी तो उसके मन में एक ही बात घूमती रही कि अंततः यह दुख होता कैसा है, जिसे समझना भी मुश्किल लगता है। उसने राजा से प्रश्न किया कि पुत्र की मृत्यु जैसा दुख कैसा होता होगा, यह मन में बार बार उठता है। राजा ने सोचा कि यह प्रश्न केवल शब्दों से समझाना कठिन है। कथा में वर्णित है कि राजा ने रानी से कहा कि जब किसी का अपना पुत्र मरता है तब ही वह इस दुख की गहराई को महसूस कर पाता है। रानी का स्वभाव सीधा और निष्कपट था। उसने इस वाक्य को शब्दशः पकड़ लिया। तत्काल उसने अपने पुत्र को गोद से उठाकर नीचे भूमि पर फेंक दिया, मानो वह उसी क्षण इस दुख को समझ लेना चाहती हो। ईश्वर की कृपा से बालक को कोई चोट नहीं लगी, वह सुरक्षित रहा। रानी ने आश्चर्य से देखा कि पुत्र को कुछ नहीं हुआ।
कथा प्रसंग 1
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