कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 48 • कथा jU9Ag3dR1AZwauaX9UUn
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यह कहानी गुजरात की लोक संस्कृति और भक्ति परंपरा की सबसे कठिन और हृदयविदारक कथाओं में से एक है। यह शेठ सगालशा, उनकी पत्नी चंपावती और उनके पुत्र चेलैया के अटूट विश्वास की गाथा है। गुजरात के 'सावरकुंडला' (कुछ कथाओं में बिलखा) के निवासी शेठ सगालशा एक अत्यंत समृद्ध और धर्मपरायण व्यक्ति थे। उनका एक ही नियम था— "अतिथि देवो भव"। वे प्रतिदिन किसी न किसी साधु या अतिथि को भोजन कराने के बाद ही स्वयं अन्न ग्रहण करते थे। उनकी पत्नी चंपावती भी इस धर्म में उनके साथ थीं। कहा जाता है कि सगालशा की भक्ति की परीक्षा लेने के लिए स्वयं भगवान (अघोरी रूप में) धरती पर आए। कई दिनों तक नगर में कोई अतिथि नहीं आया। सगालशा व्याकुल हो उठे क्योंकि बिना अतिथि सत्कार के उनका व्रत टूट रहा था।
