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पौराणिक कथाएँ 14
पौराणिक कथाएँ 14
पौराणिक पावन कथा
कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 14 • कथा qCYeZ65yHR7XQjcVVZBx
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श्री भक्तमाली जी का जन्म सन 1898 ई में मध्य प्रदेश के गुना जिले के एक छोटे से ग्राम चांचौड़ा में हुआ था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा अपने जन्म स्थान चांचौड़ा में संपन्न हुई। भक्ति के प्रबल संस्कार भक्तमाली जी में बचपन से ही थे, अन्य कार्यों को करने के साथ उनकी भक्ति में भी प्रगाड़ता आती जा रही थी। इनके मौसेरे भाई श्री लक्ष्मी दास जी, जो वृंदावन निवासी थे, कभी-कभी इनको वृंदावन की महिमा एवं कृष्ण चरित्र सुनाते रहते थे। एक दिन दर्शन के लिए लक्ष्मी दास जी इन्हें वृंदावन ले आये। यहां दर्शन अधिक करने के पश्चात हृदय में गुरु बनाने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई। भगवान दास जी टटिया स्थान के महंत के पास पहुंचे और प्रार्थना करके मंत्र दीक्षा दिलवा दी। एक बार वृंदावन आए और दर्शन के पश्चात जब वापस जाने लगे तो श्री वृंदावन धाम को प्रणाम करते हुए बोले- हे ! श्री धाम वृंदावन अब तो ऐसी कृपा करो कि दास को अपनी शरण में रख लो। ऐसा कहकर भक्तमाली जी चांचौड़ा चले गए । श्रीधाम वृंदावन तो कल्प वृक्ष के समान है। यहां जो वस्तु मांगोगे निश्चित ही प्राप्त हो जाएगा।

सनातन ज्ञान धारा • Timeless Spiritual Guidanceकृतान्त शास्त्र संग्रह
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