कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 51 • कथा 44AU485S0zLo5uJQymLg
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यह प्रसंग अष्टछाप के कवियों में सबसे मनोरंजक और हृदयस्पर्शी माना जाता है। छीतस्वामीजी पहले मथुरा के एक प्रसिद्ध 'पंडा' (पुरोहित) थे। वे स्वभाव से बहुत ही चतुर, शरारती और थोड़े अहंकारी भी थे। वे किसी को भी अपने आगे कुछ नहीं समझते थे। जब छीतस्वामीजी ने सुना कि श्री विट्ठलनाथजी (गुसाईं जी) की बहुत ख्याति हो रही है और वे साक्षात् प्रभु के स्वरूप माने जाते हैं, तो उन्होंने उनकी परीक्षा लेने की सोची। उन्होंने अपने मन में कहा— "देखूं तो सही, ये गुसाईं जी कितने पहुंचे हुए महापुरुष हैं।
