दोस्तो ऐसा हिन्दू धर्म मे माना गया है कि इन्सानो के द्वारा किया गया कोई भी दान का फल उसे ज़रूर मिलता है | हिन्दू पुराणों मे कर्मो के बारे भी विस्तार से बताया गया है की इंसान अपनी पूरी ज़िंदगी मे जो भी धर्म कर्म करता है तो उसका फल उसको इस जन्म मे और अगले जन्म मे भी मिलता है अच्छे कर्मो का अच्छा फल बुरे कर्मो का बुरा फल | एक बार ऐसे ही नारद मुनि के मन मे धर्म कर्म से मिलने वाले परिणामो को लेकर मन मे अलग अलग प्रकार विचार आने लगे | तब वह अपने यह विचार लेकर ब्रम्हा जी के पास जाते है | नारद जी ब्रम्हा जी के सामने अपने विचार प्रकट करते हुए बोलते है - हे परम् पिता ब्रम्हा जी, इंसान के द्वारा किए गए दान का फल उसे धरती पर और मरने के बाद किस रूप मे मिलता है ? तब ब्रम्हा जी , नारद जी के इन सवालो का उत्तर देते हुए बोलते है कि नारद ! जब इंसान बिना किसी लालच भाव से हमेशा के लिए किसी को कुछ देकर उसकी सहायता करता है तो इसे दान कहा जाता है यह दान कई प्रकार के होते है कई रूप मे होते है | दिल से और बिना किसी लोभ के किया गया छोटे से छोटा दान भी उतना ही पुण्य माना जाता है जितना बड़ी से बड़ी वस्तु का दान | रही बात इन दान के फल की तो उसका फल उसे मरने से पहले और मरने के बाद दोनों अवस्थाओ मे मिलता है | सबसे पहले यह जान लो की मरने के बाद कैसे दान का फल मिलता है ? मरने के बाद इंसान की आत्मा को यमलोक के दूत जिस रास्ते से यमलोक ले जाते है , वह रास्ते दो प्रकार के होते है. एक बेहद सुकून भरा आराम दायक जो कि अच्छी और महान आत्माओ के लिए होता है. दूसरा रास्ता बेहद कठिन होता है उस रास्ते पर आत्मा को ठिठुरा देने वाली सर्द हवाए चलती है अब इस मौके पर यदि उस इंसान ने किसी को कोई गरम कपड़े दान दिये होंगे तो उसे भी यहाँ उसे इन ठंड हवाओ को झेलने के लिए वैसी ही मदद मिलेगी |
कथा प्रसंग 1
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