एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब जनमेजय ने महाभारत की कथा सुनी, तो उनके मन में अपने दिवंगत पिता राजा परीक्षित को देखने की तीव्र इच्छा हुई। वैशम्पायन और व्यास जी की तपोबल से जनमेजय को उनके पिता और पूर्वजों के दर्शन कराए गए। इससे उन्हें यह संतोष मिला कि उनके पूर्वज अब मोक्ष की राह पर हैं और उन्हें अब प्रतिशोध लेने की आवश्यकता नहीं है। यह प्रसंग महाभारत के 'स्वर्गारोहण पर्व' के बाद का एक बहुत ही भावुक और दिव्य अध्याय है। यह कहानी हमें बताती है कि कैसे ज्ञान और भक्ति के माध्यम से एक पुत्र का शोक समाप्त हुआ और उसे अपने पिता की मुक्ति का साक्षात प्रमाण मिला। जनमेजय का शोक और जिज्ञासा जब ऋषि वैशम्पायन ने महाभारत की पूरी गाथा समाप्त की, तो राजा जनमेजय का हृदय ग्लानि और करुणा से भर गया। उन्होंने सुना कि कैसे उनके पूर्वजों ने महान युद्ध लड़ा, कैसे भगवान कृष्ण ने उनकी रक्षा की और अंत में कैसे उनके पिता राजा परीक्षित की मृत्यु एक ऋषि के श्राप और तक्षक के दंश से हुई।
कथा प्रसंग 1
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