लोगों का भ्रम होता है कि भगवान का भजन तो केवल भिक्षुक बनकर ही किया जा सकता है, लेकिन ऐसा नहीं है। बड़े-बड़े चक्रवर्ती सम्राट भी काफ़ी महान संत हुए हैं। यह नहीं सोचना चाहिए कि हम गृहस्थ हैं तो हम भगवान को कैसे प्राप्त कर सकते हैं। आप केवल प्रभु के हो जाइए और अपने मन, वचन और कर्म से उनको अपना स्वामी मान लीजिए। उनके जैसा प्यार करने वाला और कोई नहीं है। आसकरण जी पृथ्वीराज जी के पौत्र और भीम सिंह जी के पुत्र थे। उनके ठाकुर का नाम श्री राधामोहन जी था। ये आठों पहर अपने ठाकुर जी की सेवा में रहते थे। न कामकर्मबीजानां यस्य चेतसि सम्भवः। वासुदेवैकनिलयः स वै भागवतोत्तमः॥ जो व्यक्ति भगवान वासुदेव की अनन्य शरण ले लेता है, वह भौतिक वासना पर आधारित सकाम कर्मों से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार वह भगवत्तोत्तम माना जाता है, अर्थात् सर्वोच्च स्तर पर भगवान का शुद्ध भक्त। श्री राधामोहन जी आसकरण जी के आराध्य देव थे और हमेशा उनकी सेवा में मग्न रहते थे। आसकरण जी ने एक चौकीदार को पूजागृह के बाहर सेवा में लगाया था। और उसे आदेश दिया था कि कोई उनकी सेवा में विक्षेप ना डाल पाए। उनका रोज़ाना दस घड़ी (चार घंटे) की सेवा करने का नियम था। दिल्ली का बादशाह किसी कारण से आसकरण जी के राज्य में आया और कहा कि मुझे उनसे तुरंत मिलवाया जाए। उस से प्रार्थना की गई कि महाराज ये असंभव है। इस समय आसकरण जी अपने ठाकुर जी की सेवा में हैं और उनका आदेश है कि चार घंटे तक कोई उनकी सेवा में बाधा ना डाले। बादशाह ने आसकरण जी को सूचना देने के लिए बार-बार आदेश किया, पर किसी भी सेवक ने बादशाह की आज्ञा नहीं मानी। बादशाह को इस बात से बहुत कष्ट हुआ। उसने तुरंत अपने सेनापति को आदेश किया कि उन सबको दंड दिया जाए और आसकरण जी को बंदी बनाकर बादशाह के सामने लाया जाए। उन्हें बताया गया कि आसकरण जी को चार घंटे तक कोई सूचना नहीं पहुंचाएगा। पूरे नगर में बड़ी घबराहट फैल गई।
कथा प्रसंग 1
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