यह कहानी महाभारत और रामायण के दो महान पात्रों के मिलन की है, जो हमें सिखाती है कि ज्ञान और शक्ति कितनी भी बड़ी क्यों न हो, यदि उसमें अहंकार आ जाए तो वह व्यर्थ हो जाती है। यहाँ अर्जुन और हनुमान जी के इस पावन प्रसंग की विस्तृत कथा दी गई है: अर्जुन और हनुमान: बाणों का सेतु और अहंकार का अंत 1. रामेश्वरम के तट पर अर्जुन का विचार महाभारत के युद्ध से पूर्व, जब पांडव वनवास में थे, अर्जुन घूमते हुए दक्षिण भारत के रामेश्वरम तट पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने भगवान श्रीराम द्वारा बनाया गया वह प्रसिद्ध 'राम सेतु' देखा, जिसे पत्थरों से बनाया गया था। पुल को देखकर अर्जुन के मन में अपनी धनुर्विद्या का गर्व जाग उठा। उन्होंने पास में ही बैठे एक वृद्ध और छोटे से वानर (जो स्वयं हनुमान जी थे) से कहा— "आश्चर्य है! भगवान राम इतने महान धनुर्धर थे, फिर भी उन्हें समुद्र पार करने के लिए पत्थरों के पुल की क्या आवश्यकता पड़ी? यदि मैं उनकी जगह होता, तो अपनी धनुर्विद्या से बाणों का ऐसा मजबूत सेतु बना देता कि पूरी सेना उस पर से निकल जाती। " 2. हनुमान जी की चुनौती
कथा प्रसंग 1
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