Skip to main content
Part 1 of 4
Aa
पौराणिक कथाएँ 42
पौराणिक कथाएँ 42
पौराणिक पावन कथा
कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 42 • कथा hNHrMlGNdCt7BwIBa1u6
1 / 4

संतोषी माता को हिंदू धर्म में संतोष और धैर्य की देवी माना जाता है। लोकप्रिय मान्यताओं के अनुसार, वे भगवान गणेश की पुत्री हैं। उनकी उत्पत्ति और कथा का विवरण विशेष रूप से 'शुक्रवार व्रत कथा' में मिलता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार भगवान गणेश अपनी बहन मानसा से रक्षाबंधन बंधवा रहे थे। यह देखकर गणेश जी के पुत्रों—शुभ और लाभ—ने कौतूहलवश पूछा कि यह क्या हो रहा है? गणेश जी ने समझाया कि यह रक्षा सूत्र है जो शक्ति और प्रेम का प्रतीक है। तब शुभ और लाभ ने जिद की कि उन्हें भी एक बहन चाहिए। अपने पुत्रों की इच्छा पूरी करने के लिए और ऋद्धि-सिद्धि की सहमति से, गणेश जी ने अपनी शक्तियों से एक दिव्य ज्योति प्रकट की, जिससे एक कन्या का जन्म हुआ। चूँकि इस कन्या के जन्म से सबको 'संतोष' प्राप्त हुआ, इसलिए इनका नाम संतोषी माता रखा गया शुक्रवार व्रत कथा एक बुढ़िया के के सात बेटे थे। छः बेटे कमाते थे और सातवां बेटा नहीं कमाता था। बूढ़ी माँ कमाने वाले बेटों के लिए भोजन बनाकर उन्हें खिलाती और बची हुई झूठन सातवें बेटे को दे दिया करती थी। बेटे को यह पता नहीं था। उसकी पत्नी ने उसे यह बात बताई। उसे विश्वास नहीं हुआ। छुपकर देखा तो उसे पता चला की यह सच था। उसे बड़ा दुःख हुआ। माँ के खाना खाने बुलाने पर वह बोला – मैं यह खाना नहीं खाऊंगा। परदेस जाकर कमाई करूँगा। माँ बोली – कल जाता हो तो आज ही चला जा। यह सुनकर वह तुरंत घर से निकल गया। रास्ते में पत्नी से मिला। वह गोबर से कंडे बना रही थी। बोला – मैं परदेस जा रहा हूँ कुछ समय बाद लौटूंगा। तुम अपना धर्म का पालन करते हुए ध्यान से रहना। वह बोली आप मेरी चिंता ना करें। मुझे भूलना मत और मुझे अपनी कुछ निशानी दे दो। उसे देखकर मैं समय बिता लूँगी। उसने उसे अपनी अंगूठी दे दी और चल पड़ा। एक बड़े शहर में बड़ी दुकान देखकर उसने काम माँगा। वहां जरुरत थी इसलिए सेठ ने उसे काम पर रख लिया।

सनातन ज्ञान धारा • Timeless Spiritual Guidanceकृतान्त शास्त्र संग्रह
1 / 4