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पौराणिक कथाएँ 46
पौराणिक कथाएँ 46
पौराणिक पावन कथा
कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 46 • कथा RfVgpczdhk1eqGIHm3yR
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यह कथा 'चौरासी वैष्णवन की वार्ता' (कुंभनदास जी की वार्ता) का एक अत्यंत भावुक और महत्वपूर्ण प्रसंग है। इसका मूल सार यह है कि भक्त अपने नियम पर अडिग रहता है, लेकिन भगवान अपने भक्त का मान रखने के लिए अपने स्वयं के नियम (मर्यादा) भी तोड़ देते हैं। कुंभनदास जी अष्टछाप के कवियों में से एक थे। उनका जीवन पूरी तरह से श्रीनाथजी (गोवर्धन पर्वत) को समर्पित था। उनके तीन कड़े नियम थे: * वे कभी गोवर्धन पर्वत की तलहटी छोड़कर कहीं नहीं जाते थे। * वे कभी यमुना पार नहीं करते थे (क्योंकि उनका मानना था कि उनके ठाकुरजी गिरिराज जी पर ही विराजते हैं)। * वे श्रीनाथजी की आठों समय की झांकी (दर्शन) में से एक भी मिस नहीं करते थे।

सनातन ज्ञान धारा • Timeless Spiritual Guidanceकृतान्त शास्त्र संग्रह
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