कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 46 • कथा mSDQwBh6kHEa9SxzDv2O
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पुष्टिमार्ग के इतिहास में जमनादास जी एक ऐसे अनन्य भक्त हुए हैं, जिनके लिए श्रीनाथ जी की सेवा ही जीवन का एकमात्र ध्येय था। उनके हृदय में प्रभु के प्रति जो अनुराग था, वह किसी लौकिक वस्तु या धन-संपदा के मोह से कहीं ऊपर था। एक समय की बात है, जमनादास जी अपने आराध्य श्री ठाकुर जी के श्रृंगार के लिए पुष्प लेने बाजार निकले। घूमते-घूमते उनकी दृष्टि एक माली की दुकान पर पड़ी, जहाँ एक अत्यंत सुंदर, खिला हुआ और सुगंधित कमल का पुष्प रखा था। उस पुष्प की आभा ऐसी थी मानो वह साक्षात लक्ष्मी का स्वरूप हो। जमनादास जी के मन में तुरंत विचार आया— "अहा! आज यदि यह दिव्य कमल श्रीनाथ जी के चरणों में अर्पित हो जाए, तो प्रभु कितने प्रसन्न होंगे! " तभी वहाँ एक यवनराज (नवाब) अपनी प्रियसी के लिए पुष्प खरीदने पहुँचा।
