कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 46 • कथा oFHrxRsx5H0CO2nKgupG
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पुरी धाम की पवित्र भूमि पर गोविंद दास नाम का एक समृद्ध व्यापारी रहता था। धन की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उसकी असली पहचान उसकी गहरी आस्था थी—भगवान जगन्नाथ के प्रति अटूट भक्ति। गोविंद दास का एक अटल नियम था कि जब तक वह भगवान को भोग न लगा दे, तब तक स्वयं भोजन का एक कौर भी नहीं खाता था। चाहे वह घर में हो, यात्रा पर हो या किसी समारोह में—हर जगह पहले प्रभु, फिर खुद। उसकी पत्नी कमला को यह सब एक तरह का दिखावा लगता था। वह अक्सर ताना मारते हुए कहती—“क्या सच में भगवान रोज तुम्हारे हाथ से खाने आते हैं? ” गोविंद दास बस मुस्कुराकर कहता—“प्रभु भाव देखते हैं, दिखावा नहीं। ” एक दिन कमला के मायके में बड़ा भोज आयोजित हुआ।
