कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 47 • कथा B1y5V9ivMvt83avpS3XD
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ना चलाओ बाण, व्यंग के ऐ विभिषण, ताना ना सह पाऊं, क्यूँ तोड़ी है ये माला, तुझे ए लंकापति बतलाऊं, मुझमें भी है तुझमें भी है, सब में है समझाऊँ, ऐ लंकापति विभीषण, ले देख, मैं तुझको आज दिखाऊं। । श्री राम जानकी बैठे हैं मेरे सीने में,
