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पौराणिक कथाएँ 47
पौराणिक कथाएँ 47
पौराणिक पावन कथा
कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 47 • कथा lOJhnuUkfgbn6BkXWQTR
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यह सुंदर दोहा संतोष और ईश्वर पर अटूट विश्वास का संदेश देता है। यह अक्सर संत कवियों द्वारा मन की चिंता और भविष्य के डर को दूर करने के लिए सुनाया जाता है। यहाँ इस दोहे का भावार्थ और इसके पीछे की कहानी का सार दोहे का भावार्थ: * जब दाँत न थे तब दूध दियो, अब दाँत भये कहा अन्न न दैहै। * जब बच्चा पैदा होता है, तो उसके पास भोजन चबाने के लिए दांत नहीं होते। उस समय ईश्वर ने माँ के स्तनों में दूध का प्रबंध पहले ही कर दिया होता है। कवि कहते हैं कि अगर उसने बिना दांतों के तुम्हारी रक्षा की, तो अब जब तुम्हारे पास दांत हैं, तो क्या वह तुम्हें अन्न (भोजन) नहीं देगा? * जीव बसें जल में, थल में, तिनकी सुधि लेइ सो तेरी हूँ लैहै।

सनातन ज्ञान धारा • Timeless Spiritual Guidanceकृतान्त शास्त्र संग्रह
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