यह कहानी पश्चिम बंगाल के श्रीखण्ड नाम के एक छोटे से गाँव की है, जहाँ भगवान के परम भक्त श्री मुकुंद दास रहा करते थे। उनके घर में भगवान श्री गोपीनाथ जी का एक बहुत ही सुंदर विग्रह (मूर्ति) प्रतिष्ठित था। मुकुंद दास जी का पूरा जीवन गोपीनाथ जी की सेवा में ही बीतता था। एक दिन की बात है, मुकुंद दास जी को किसी आवश्यक कार्य से गाँव से बाहर जाना पड़ा। उन्होंने अपने छोटे पुत्र रघुनंदन को पास बुलाया और बड़े प्यार से समझाया, "बेटा, मुझे बाहर जाना है। तुम बड़ी सावधानी और श्रद्धा से गोपीनाथ जी को समय पर भोग लगा देना। ध्यान रखना, ठाकुर जी भूखे न रहें। " रघुनंदन अभी बालक ही थे, उन्होंने बड़ी मासूमियत से पिता की आज्ञा मान ली। दोपहर हुई, तो माँ ने आवाज़ दी, "रघुनंदन, भोग तैयार है। जाओ, ठाकुर जी को अर्पित कर दो। " रघुनंदन ने हाथ-पैर धोए, भोग की थाली सजाई और मंदिर में जाकर भगवान के सामने रख दी।
कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 16 • कथा D81qAR9VwyEuWx7hdjMA
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