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पौराणिक कथाएँ 16
पौराणिक कथाएँ 16
पौराणिक पावन कथा
कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 16 • कथा dlh28qYNF9pcXxtBTp12
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भारत में जिस तरह महादेव शिव के 12 ज्योतिर्लिंग उनके निवास स्थान के तौर पर मशहूर हैं, ठीक उसी तरह देश में चारों दिशाओं में चार वैष्णव धाम भी हैं जो कि भगवान विष्णु का घर कहलाते हैं. ये चारों विष्णु धाम चार पुरियों के रूप में प्रसिद्ध हैं, जिनमें जगन्नाथ धाम का अलग ही महत्व है. एक आम मान्यता है कि श्रीविष्णु बद्रीनाथ में अलकनंदा नदी में स्नान करते हैं. द्वारिका पुरी में वस्त्र पहनते हैं. पुरी यानी जगन्नाथ धाम में भोजन करते हैं और फिर रामेश्वरम में रात्रि शयन करते हैं. बद्रीनाथ में जहां भगवान विष्णु अवतार में हैं तो वहीं द्वारिका में वह द्वारिकाधीश कृष्ण हैं और राजा हैं. रामेश्वरम, जो कि वैसे तो महादेव शिव का धाम है, लेकिन यहां महाविष्णु श्रीराम के रूप में पूजे जाते हैं तो पुरी धाम में वह आम भक्तों के लिए सहज उपलब्ध हैं. यहां वह सखा हैं, साथी हैं और अपने दीनबंधु नाम को सार्थक करते हैं. पुरी में विष्णुजी के भोजन करने की मान्यता के कारण ही यहां का 'महाभोग-महाप्रसाद' बहुत प्रसिद्ध है. एक किवदंती है कि सभी को कृपा के रूप में मिलने वाला ये महाभोग पहले सिर्फ विष्णुजी के लिए ही था. यहां देवी लक्ष्मी उनके लिए अपने हाथों से पकवान बनाकर और थाल सजाकर उन्हें भोजन कराती थीं. ऐसा इसलिए क्योंकि वह त्रेतायुग में सीता के रूप में श्रीराम को ठीक से भोजन नहीं करा सकी थीं. इस महाभोग को पाने के लिए शिवजी और ब्रह्माजी ने बहुत कोशिश की, लेकिन विफल रहे. फिर उन्होंने योजना के तहत नारद मुनि को अपनी लालसा पूरी करने का जरिया बनाया. देवर्षि नारद पुरी के जगन्नाथ धाम पहुंचे तो थे महाभोग की लालसा में लेकिन, उसे पाने में विफल रहने के बाद उन्होंने माता लक्ष्मी से प्रार्थना करते हुए कहा कि, नारायण की सेवा को मैं हमेशा करता ही रहता हूं, अपनी भी सेवा का अवसर आप मुझे दें. देवी लक्ष्मी ने नारद मुनि की बात मान ली और उन्हें कभी ईंधन लाने, कभी जल लाने, कभी अन्न लाने आदि के काम में लगा दिया. इस तरह देवर्षि नारद 12 वर्षों तक देवी लक्ष्मी की सेवा करते रहे. इस तरह वह लक्ष्मीजी की सुबह से लेकर शाम तक की सारी दिनचर्या समझ चुके थे. एक दिन देवर्षि नारद भोर की पूजा के लिए वन से लाए कई सुगंधित फूलों की एक माला लेकर लक्ष्मीजी की सेवा में पहुंचे और उन्हें ये माला पूजा के लिए भेंट में दी. कुछ पुष्पों की सुगंध और कुछ नारद मुनि की इतने साल की सेवा से प्रभावित होकर देवी लक्ष्मी ने उनसे उस दिन वरदान मांगने के लिए कह दिया.

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