कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 44 • कथा 8wrPiXX4EzHPCB4Ez1Lo
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अष्टछाप के कवियों में श्री परमानंददासजी का स्थान अत्यंत निराला है। यदि सूरदासजी 'जहाज' थे, तो परमानंददासजी उस जहाज की वह 'मिठास' थे जो सीधे हृदय में उतर जाती थी। कहा जाता है कि उनके पदों में इतना करुण और वात्सल्य रस था कि स्वयं महाप्रभु वल्लभाचार्य जी उनके पद सुनकर सुध-बुध खो बैठते थे। श्री परमानंददासजी: "जब गुरु भी भाव-विभोर हो गए" परमानंददासजी पहले कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे और भगवान के विरह (जुदाई) के पद गाया करते थे।
