कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 12 • कथा ApQ1Lt3SRcMvkwzwLadk
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करमानन्द जी अपने गायन से प्रभु की सेवा किया करते थे। इनका गायन इतना भावपूर्ण होता था कि पत्थर-हृदय भी पिघल जाता था। ज्यादा दिनों तक इनको गृहस्थी रास नहीं आयी और ये सब कुछ छोड़कर निकल पड़े। इनके पास केवल दो चीजें ही थीं एक छड़ी और दूसरा ठाकुरबटुआ जिसे ये गले में टाँगे कर चलते थे। ये जहाँ विश्राम करने के लिये ठहरते वहाँ छड़ी को गाड़ देते और उस पर ठाकुर बटुआ लटका देते थे। इससे ठाकुरजी को झूला झूलने का आनन्द मिलता था।
