एक दिन एक राजा ने अपने राजपंडित को बुलाया और बहुत सख्ती के साथ उसे आदेशित करते हुए कहा- "राजा परीक्षित ने शुकदेव से भगवत गीता सुनकर मोक्ष प्राप्त किया था। उन्हें केवल सात दिन लगे। मैं आपको सभी बंधनों से मुझे मुक्त कराने के लिए एक महीने का समय दे रहा हूँ ताकि आप मुझे मोक्ष प्राप्त करने में सहभागी बनें। यदि आप ऐसा न कर सके तो मैं आपकी सारी संपत्ति जब्त कर लूँगा, और असफल होने की अवस्था में आप की सजा मृत्युदण्ड होगी। ” राजा के इस आदेश ने राजपंडित को अत्यधिक चिंतित कर दिया। वह जानते थे कि वह स्वयं विद्वान तो हैं मगर राजा को मोक्ष दिला सकें ऐसी विद्वता तो न थी उनमें। इस चिंता में अब न उन्हें न तो भूख लगती और न ही नींद। उसका तनाव दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा था। एक दिन संयोग से जब वह अपने परिवार के साथ भोजन कर रहा था तो उसका बेटा, जो आमतौर पर अपना भोजन अलग से करता था और जो अपने पिता से यदा-कदा ही मिलता था उस दिन पिता के साथ खाना खाने बैठा तो बेटे ने गौर किया कि उसके पिता बहुत उदास दिख रहे हैं।
कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 12 • कथा ETuY54U7Ao5tJotGoBek
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