कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 36 • कथा R1xm5wr5uzjSmGc7H798
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पुष्टिमार्ग की मधुर परंपरा में यह प्रसंग भक्त और भगवान के अलौकिक संबंध को अत्यंत सुंदर ढंग से प्रकट करता है। कहा जाता है कि जिन्होंने कभी कृष्णदासजी को यह सुनाया था कि — “आचार्यश्री ने आपको श्री गोवर्धनधारण का प्रबंध सौंपा है, मानो आपने उन्हें वश में कर लिया हो…” — वही महाभक्त सूरदास स्वयं भी श्रीनाथजी के अनुग्रह से बँधे थे। पर प्रश्न यह है — क्या वास्तव में श्रीनाथजी किसी के वश में होते हैं? हाँ भी… और नहीं भी। वे प्रेम के बंधन में बँध जाते हैं, परंतु स्वभाव से पूर्ण स्वतंत्र हैं। वे अपनी इच्छा से लीला करते हैं। इसी रहस्य को आचार्यों ने “वैषम्य-नैघृण्य” जैसे गूढ़ शब्दों में व्यक्त किया है — अर्थात् प्रभु किसी के प्रति पक्षपात या क्रूरता से नहीं, बल्कि अपनी दिव्य लीला से प्रेरित होकर व्यवहार करते हैं।
