एक नगर में बहुत धनवान साहूकार रहता था। उसके पास धन की कमी नहीं थी लेकिन पुत्र नहीं होने के कारण वह बहुत दुखी रहता था। पुत्र की कामना में वह हर सोमवार शिवजी का व्रत और पूजन करता था और शाम को मंदिर जाकर शिव जी के सामने दिया जलाया करता था। उसकी भक्ति देखकर माता पार्वती ने शिवजी से कहा कि यह साहूकार आपका व्रत और पूजन नियमपूर्वक श्रद्धा से करता है। आपको इसकी मनोकामना पूर्ण करनी चाहिए। शिव जी ने कहा – यह संसार कर्म क्षेत्र है। किसान जैसा बीज खेत में बोता है वैसी ही फसल काटता है। इसी प्रकार मनुष्य जैसे कर्म करता है वैसा ही फल पाता है। माता पार्वती ने अधिक आग्रह करके कहा – यह आपका अनन्य भक्त है। आप सदैव अपने भक्तों पर दयालु होते हैं। उनका दुःख दूर करते हैं। ऐसा नहीं करेंगे तो मनुष्य आपका व्रत और पूजन क्यों करेंगे अतः इसका दुःख दूर करें। माता पार्वती का ऐसा आग्रह देखकर शिवजी बोले – इसके कोई पुत्र नहीं है। इसलिए ये इतना दुखी है। इसके भाग्य में पुत्र नहीं है फिर भी में इसे बारह साल तक के लिए पुत्र का वर देता हूँ लेकिन बारह वर्ष बाद उसकी मृत्यु हो जाएगी। मैं इसके लिए इतना ही कर सकता हूँ। माता पार्वती और भगवान् शिव की ये बातें साहूकार सुन रहा था। इसे सुनकर वह न तो खुश हुआ ना दुखी हुआ। वह पहले की तरह शिव जी का व्रत और पूजन करता रहा। कुछ समय बाद साहूकार की पत्नी के गर्भ से दसवें महीने में अति सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ।
कथा प्रसंग 1
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