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पौराणिक कथाएँ 18
पौराणिक कथाएँ 18
पौराणिक पावन कथा
कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 18 • कथा aa7gb90weqV29EOzh7r3
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जब हनुमान ने सभा के बीच अपना हृदय चीर दिया भक्ति का वह क्षण, जिसने अयोध्या को रुला दिया " ------------- अयोध्या की एक सभा उस क्षण इतिहास बन गई, जब भक्ति ने शब्दों से नहीं, हृदय से उत्तर दिया। देवी सीता द्वारा अर्पित हार से उठा एक साधारण-सा प्रश्न, पवनपुत्र हनुमान की भक्ति के माध्यम से परम सत्य में बदल गया। वह दृश्य केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं था, बल्कि यह संदेश था कि जहाँ प्रेम निष्काम हो और सेवा निरहंकार, वहीं सच्ची भक्ति निवास करती है। अयोध्या की वह रात सामान्य नहीं थी। रात गहरी थी। अयोध्या में दीपक बुझ चुके थे, पर राजमहल के प्रांगण में एक दीप अभी भी टिमटिमा रहा था। वह दीपक न तेल से जल रहा था, न बाती से, वह किसी और ही अग्नि से प्रज्वलित था – भक्ति की अग्नि से। उस दीप के सामने वानर रूप में बैठा था – पवनपुत्र हनुमान। श्रीराम के अयोध्या लौटे कई वर्ष हो चुके थे। राज्य में समृद्धि थी, शांति थी, पर हनुमान के हृदय में एक गहरा कंपन था। सेवा करने का अवसर मानो कम हो गया था; न लंका थी, न सेतु था, न कोई युद्ध, न कोई संकट। अब सब ठीक था – बस यही बात हनुमान जी को बेचैन कर रही थी। उन्होंने अकेले में कहा – “प्रभु… जब तक आप वन-वन भटक रहे थे, तब तक मेरा हर श्वास सेवा में था। अब जब सब कुछ सुन्दर है, तो मेरी साँसें खाली क्यों लग रही हैं? ” उस रात वे राजमहल के पिछवाड़े वाले बाग़ में जाकर एक कोने में बैठ गए। चाँदनी उनके कंधों पर गिर रही थी, पर उनके भीतर अंधेरा घना था। राम नाम के बदले इनाम ---------------------- कुछ ही दिन बाद अयोध्या में एक भव्य यज्ञ का आयोजन हुआ। राज्य के कोने-कोने से ऋषि, मुनि, देवदूत, साधु–संत आए। सबके लिए वस्त्र, आभूषण, रत्न और धन की व्यवस्था की गई। जो भी यज्ञ में सेवा करता, उसे राम स्वयं पुरस्कृत करते। यज्ञ के अंतिम दिन श्रीराम ने घोषणा की – “जो भी इस यज्ञ में सेवा और भक्ति से जुड़ा है, उसे आज सम्मान दिया जाएगा। ” सभा में उल्लास फैल गया। सबने मन ही मन सोचा, “आज कुछ न कुछ तो मिलेगा।

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