कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 18 • कथा arwjtZlBBAOLvbFhxcts
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मलूक दास जी की 'हठ' और उनके विश्वास की कहानियाँ जितनी अद्भुत हैं, उतनी ही गहरी सीख भी देती हैं। मलूक दास और बनिए का कर्ज मलूक दास जी अपनी कुटिया में भजन-कीर्तन करते थे। जो भी साधु-संत उनके पास आते, वे उन्हें भोजन कराते। इस सेवा में काफी खर्च होता था। एक बार आश्रम में अनाज खत्म हो गया और बहुत से साधु जमा हो गए। मलूक दास जी ने गाँव के एक धनी बनिए से उधार अनाज और घी ले लिया। उन्होंने वादा किया कि "जब ईश्वर भेजेंगे, मैं चुका दूँगा। " बनिए का तकादा समय बीतता गया, लेकिन मलूक दास जी के पास पैसे कहाँ से आते? वे तो बस राम-नाम में लीन थे। बनिया परेशान हो गया। उसने गाँव में शोर मचा दिया— "मलूक दास ढोंगी है! साधुओं को खिलाने के लिए मेरा पैसा मार लिया। " एक दिन बनिया कुटिया पर आया और मलूक दास जी को अपमानित करने लगा:
