मनसा माता -सर्पों की देवी, अस्वीकार और स्वीकृति की अद्भुत कथा भारत की धार्मिक परंपराओं में अनेक देवियाँ ऐसी हैं जिनकी महिमा केवल शास्त्रों में ही नहीं, बल्कि लोकजीवन में भी गहराई से जीवित है। ऐसी ही एक रहस्यमयी और शक्तिशाली देवी हैं मनसा माता—जिन्हें सर्पों की अधिष्ठात्री देवी, विषनाशिनी और नागलोक की संरक्षिका माना जाता है। विशेष रूप से बंगाल, असम, ओडिशा और पूर्वी भारत में मनसा माता की पूजा अत्यंत प्राचीन काल से प्रचलित है। ग्रामीण समाज में उन्हें सर्पदंश से रक्षा करने वाली देवी के रूप में अत्यधिक श्रद्धा से पूजा जाता है। मनसा माता की कथा केवल एक देवी की महिमा का वर्णन नहीं करती। यह कथा है— अस्वीकार की पीड़ा मान्यता प्राप्त करने के संघर्ष की और अंततः श्रद्धा द्वारा स्वीकृति प्राप्त करने की। उनकी कहानी भारतीय पौराणिक और लोक परंपराओं की सबसे मार्मिक कथाओं में से एक है। मनसा माता की उत्पत्ति मनसा माता की उत्पत्ति के विषय में विभिन्न ग्रंथों और लोककथाओं में कई विवरण मिलते हैं। प्रमुख रूप से उनका उल्लेख निम्न ग्रंथों में मिलता है— देवी भागवत पुराण ब्रह्मवैवर्त पुराण मनसामंगल (बंगाल का प्रसिद्ध काव्य) पौराणिक मान्यता के अनुसार मनसा माता को भगवान शिव की पुत्री माना जाता है। कुछ कथाओं के अनुसार वे शिव के मन से उत्पन्न हुई शक्ति हैं, इसी कारण उनका नाम “मनसा” पड़ा—अर्थात् मन से उत्पन्न। एक अन्य लोककथा के अनुसार शिव के तेज से उत्पन्न दिव्य शक्ति पृथ्वी पर गिरी और उसका पालन-पोषण नागों ने किया। इसी कारण उनका नागों से गहरा संबंध माना जाता है। कई परंपराओं में उन्हें महान नागराज वासुकी की बहन भी कहा गया है।
कथा प्रसंग 1
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