महाभारत केवल युद्ध की कथा नहीं है, वह कर्म और दण्ड का जीवित शास्त्र है। दुर्योधन ने सभा में एक अबला स्त्री की ओर संकेत कर अपनी जंघा ठोकी थी— तो उसी जंघा को युद्धभूमि में तोड़ दिया गया। दुःशासन ने अपनी छाती ठोकी थी— तो उसकी छाती को चीर कर उसका अंत किया गया। यह संयोग नहीं था, यह न्याय था। महारथी कर्ण ने एक असहाय स्त्री के अपमान का न केवल समर्थन किया, बल्कि उसे धर्मसम्मत ठहराने का प्रयास किया। उसके बदले श्रीकृष्ण ने उसे उसी असहाय अवस्था में मरने दिया— रथ धँसा हुआ, अस्त्र निष्क्रिय, और सहायता के सभी मार्ग बंद। क्योंकि जो स्त्री की असहायता पर हँसता है, वह दया का अधिकारी नहीं होता। भीष्म पितामह ने प्रतिज्ञा की आड़ में अन्याय को मौन स्वीकृति दी। उन्होंने एक स्त्री का अपमान होते देखा—और रोका नहीं। इसका दण्ड यह हुआ कि वे स्वयं असंख्य बाणों की शय्या पर पड़े रहे, अपने कुल की चार पीढ़ियों को मरते हुए देखा, और इच्छा-मृत्यु का वरदान होते हुए भी तब तक देह नहीं त्याग सके,
कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 41 • कथा zAcSVuUUb1Ff0S8ALDyL
1 / 4
