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पौराणिक कथाएँ 49
पौराणिक कथाएँ 49
पौराणिक पावन कथा
कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 49 • कथा qJ3vTkRticNZMXkSVWoH
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एक बड़ा शहर था, जहां लाखों लोग रहा करते थे। तब के जमाने में लोग एक साथ रहते थे और एक दूसरे की मदद करते थे। लेकिन नए जमाने मे लोगों का स्वरूप एकदम ही अलग है। सभी अपने-अपने कार्यों में व्यस्त रहते हैं और किसी को किसी की परवाह नहीं रहती है। घर के सदस्यों को भी एक दूसरे की परवाह नहीं रहती। भजन-कीर्तन, भक्ति-भात्र, दया-माया, परोपकार जैसे संस्कार कम हो गए। शहर में बुराइयां बढ़ गई थी। शराब, जुआ, रेस, व्यभिचार, चोरी डकैती वगैरह बहुत से गुनाह शहर में हो रहे थे। कहावत है कि 'हजारों निराशा में एक अमर आशा छिपी हुई है। ' इसी प्रकार इतनी बुराइयों के बावजूद शहर में कुछ अच्छे लोग भी रहते थे। इन्हीं अच्छे लोगों में शीला और उनके पति की गृहस्थी मानी जाती थी। शीला धार्मिक प्रकृति की और संतोषी थी। उनका पति भी विबेकी और सुशील था। शीला और उनका पति ईमानदारी से जीते थे। वे किसी की बुराई करते न थे और प्रभु भजन में अच्छी तरह समय व्यतीत कर रहे थे। उनकी गृहस्थी आदर्श गृहस्थी थी और शहर के लोग उनकी गृहस्थी की सराहना करते थे। शीला की गृहस्थी इसी तरह खुशी-खुशी चल रही थी। पर कहा जाता है कि 'कर्म की गति अक्ल है', विधाता के लिखे लोग कोई नहीं समझ सकता है। इंसान का नसीब पल भर में राजा को रंक बना देता है और रंक को राजा। शीला के पति के अगले जन्म के कर्म भोगने के बाकी रह गए होंगे कि वह बुरे लोगों से दोस्ती कर बैठा। वह जल्द से जल्द 'करोड़पति होने के ख्वाब देखने लगा। इसलिए वह गलत रास्ते पर चढ़ गया और 'करोड़पति' की बजाय 'रोडपति' बन गया। यानी रास्ते पर भटकते भिखारी जैसी उसकी हालत हो गई थी। शहर में शराब, जुआ, रेस, चरस-गांजा वगैरह बदियां फैली हुई थीं। उसमें शीला का पति भी फंस गया। दोस्तों के साथ उसे भी शराब की आदत हो गई। जल्द से जल्द पैसे वाला बनने की लालच में दोस्तों के साथ रेस जुआ भी खेलने लगा। इस तरह बचाई हुई धनराशि, पत्नी के गहने, सब कुछ रेस जुए में गंवा दिया था। इसी तरह एक वक्त ऐसा भी था कि वह सुशील पत्नी शीला साथ मजे में रहता था और प्रभु भजन में सुख-शांति से वक्त व्यतीत करता था। उसके बजाए घर में दरिद्रता और भूखमरी फैल गई। सुख से खाने की बजाए दो वक्त भोजन के लाले पड़ गए। और शीला को पति की गालियां खाने का वक्त आया था। शीला सुशील और संस्कारी स्त्री थी। उसको पति के बर्ताव से बहुत दुख हुआ। लेकिन वह भगवान पर भरोसा करके बड़ा दिल रखकर दुख सहने लगी। कहा जाता है कि 'सुख के पीछे दुख और दुख के पीछे सुख' आता ही है। इसलिए दुख के बाद सुख आएगा ही, ऐसी श्रद्धा के साथ शीला प्रभु भक्ति में लीन रहने लगी। इस तरह शीला असहाय दुख सहते-सहते प्रभु भक्ति में वक्त बिताने लगी। अचानक एक दिन दोपहर को उनके द्वार पर किसी ने दस्तक दी। शीला सोच में पड़ गई कि मुझ जैसे गरीब के घर इस वक्त कौन आया होगा? फिर भी द्वार पर आए हुए अतिथि का आदर करना चाहिए, ऐसे आर्य धर्म के संस्कार वाली शीला ने खड़े होकर द्वार खोला। देखा तो एक मांजी खड़ी थी। वे बड़ी उप्त की लगती थी। किन्तु उनके चेहरे पर अलौकिक तेज निखर रहा था। उनकी आंखों में से मानो अमृत बह रहा था। उनका भव्य चेहरा करुणा और प्यार में छलकता था। उनको देखते ही शोला के मन में अपार शांति छा गई। वैसे शीला इस मांजी को पहचानती न थी। फिर भी उनको देखकर शीला के रोम-रोम में आनंद छा गया। शीला मांओं को आदर के साथ घर में ले आई। घर में बिठाने के लिए कुछ भी नहीं था। अतः शीला ने सकुचा कर एक फटी हुई चादर पर उनको बिठाया। मांजी ने कहा- क्यों शीला। मुझे पहचाना नहीं ? शीला ने सकुचा कर कहा मां आपको देखते ही बहुत खुशी हो रही है।

सनातन ज्ञान धारा • Timeless Spiritual Guidanceकृतान्त शास्त्र संग्रह
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