कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 49 • कथा yRWCEe5IWsv962XmW0a0
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अष्टछाप के कवियों में श्री गोविंदस्वामीजी का व्यक्तित्व सबसे निराला और थोड़ा 'अक्खड़' माना जाता है। वे स्वभाव से बहुत ही निडर, स्पष्टवक्ता और थोड़े क्रोधी भी थे, लेकिन प्रभु के प्रति उनका प्रेम इतना गहरा था कि स्वयं श्रीनाथजी उनके साथ लुका-छिपी खेलते थे। गोविंदस्वामीजी के बारे में प्रसिद्ध है कि वे पहले एक डाकू (लुटेरे) थे, लेकिन एक बार विट्ठलनाथजी (गुसाईं जी) के दर्शन मात्र से उनका हृदय परिवर्तन हो गया और वे 'महाप्रभु' के चरणों में समर्पित हो गए। श्री गोविंदस्वामीजी: "जब प्रभु हार गए" गोविंदस्वामीजी गोवर्धन की कंदराओं और 'कदंब खंडी' में निवास करते थे।
