प्राचीन समय की बात है, श्री दास जी महाराज नामक एक परम विरक्त और श्रद्धालु महात्मा हुए। उनका जीवन केवल एक ही नियम पर टिका था— 'सन्त सेवा ही प्रभु सेवा है'। वे मानते थे कि मंदिर की मूर्ति में जो चेतना है, वही चेतना संतों के हृदय में साक्षात स्पंदित होती है। उनके द्वार से कभी कोई साधु-सन्त बिना सेवा और भोजन के नहीं लौटा। एक बार की बात है, श्री दास जी के आश्रम में संतों की एक बड़ी मंडली पधारी। संध्या का समय था, आकाश में लालिमा छाई थी और मंदिर में शंख-घड़ियाल गूंज रहे थे। संध्या आरती संपन्न हुई। दास जी ने बड़े चाव से संतों के लिए उत्तम भोजन तैयार करवाया। भोजन के उपरांत, शीतल रात्रि में उन्होंने सभी संतों के विश्राम की व्यवस्था की। दास जी का हृदय आनंद से भरा था। वे एक-एक सन्त के पास जाते, उनके चरण दबाते, उनके वस्त्र व्यवस्थित करते और उनकी आध्यात्मिक चर्चा सुनते। संतों की सेवा के उस रस में वे ऐसे डूबे कि उन्हें समय का भान ही नहीं रहा।
कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 54 • कथा 9vRl3QCW4vZMMGlkb2TE
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